शहर में रही जश्ने ईद उल फितर की रौनक |

शहर में रही जश्ने ईद उल फितर की रौनक |

शहर में रही जश्ने ईद उल फितर की रौनक

लोगों ने गले मिलकर ईद उल फितर की दी मुबारकबाद ईद का त्यौहार का मतलब भाईचारे मोहब्बत का त्यौहार

लाखेरी शहर की बड़ी ईदगाह मस्जिद एसीसी कॉलोनी रामधन चौराया पर ईद उल फितर की नमाज 8:45 पर अदा की गई जिसमें शहर के मुस्लिम भाइयों के साथ साथ आसपास गांव के मुसलमानों ने आकर ईद की नमाज अदा की. हाफिज कामिल के द्वारा ईद उल फितर की नमाज अदा की गई देश की तरक्की व देश में भाईचारा व अमन शांति के लिए दुआ की गई नमाजियों ने आपस में गले मिलकर एक दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी मुसलमानों को ईद की मुबारकबाद देने के लिए शहर के समाजसेवी भी वहां पर एकत्रित हुए उन्होंने भी सभी लोगों के लिए ईद की शुभकामनाएं दी असामाजिक आपदा से निपटने के लिए लाखेरी पुलिस प्रशासन भी वहां पर तैनात रहा सभी लोगों ने नमाज अदा करने के बाद पुलिस प्रशासन को ईद की मुबारकबाद दी व शुक्रिया अदा किया. वैसे तो इतनी फितर त्यौहार का मतलब मोहब्बत का त्यौहार है इस दिन लोग अपने सारे गिले-शिकवे दुश्मनी भुलाकर गले मिलते हैं ईद उल फितर पर हमारे हिंदी साहित्य के बहुत से लेखकों ने भी ईद उल फितर पर लेख लिखे हैं जैसे ईदगाह इत्यादि हमारे हिंदी जगत के सिनेमा में भी ईद के बारे में बताया गया है. मुस्लिम शहंशाह ने अपनी जीवनी में यहां तक कह दिया कि मुसलिम देशों के मुकाबले हिंदुस्तान मैं ईद का त्योहार ज्यादा खुशी व हर्षोल्लास केेेे साथ मनाया जाता है. 

ईद इसलिए मनाई जाती है

ईद-उल-फितर को मीठी ईद के रूप में भी कहां जाता है। हिज़री कैलेंडर के अनुसार दसवें महीने यानी शव्वाल के पहले दिन ये त्योहार दुनिया भर में मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर में ये महीना चांद दिखने के साथ शुरू होता है। जब तक चांद नहीं दिखे तब तक रमजान का महीना खत्म नहीं माना जाता। इस तरह रमजान के आखिरी दिन चांद दिख जाने पर अगले दिन ईद मनाई जाती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन हजरत मुहम्मद मक्का शहर से मदीना के लिए निकले थे।

मक्का से पैगंबर के जाने के बाद पवित्र शहर मदीना मुनव्वरा में ईद-उल-फितर का त्यौहार मनाया गया । बताया जाता है कि पैगम्बर ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी।इस जीत की खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया था, इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रुप में मनाया जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) ईद-उल-फितर मनाया गया था। पैगम्बर ने बताया है कि त्योहार मनाने के लिए अल्लाह ने कुरान में पहले से ही 2 सबसे पवित्र दिन बताए हैं। जिन्हें ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा कहा गया है। इस प्रकार ईद मनाने की परंपरा रोशनी में आई।

ईद उल फितर मोहब्बत का त्यौहार है

ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एकसाथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में जकात( दान) ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ जकात (दान) करने के लिए इस्लाम में बोला गया है। कुरान में ज़कात अल-फ़ित्र को अनिवार्य बताया गया है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। ताकि गरीब लोग भी खुश होकर ईद की नमाज व ईद की खुशियां मना सकें. रमजान के अंत में लोगों को ईद की नमाज पर जाने से पहले दिया जाता है। हर साल मुस्लिम अपनी संपत्ति 2.50 प्रतिशत जकात के रूप में दान गरीब और जरूरतमंदों को कर देते हैं।

ईद के दिन की शुरुआत कैसे होती है

ईद की शुरुआत सुबह की पहली दुआ के साथ होती है। जिसे सलात अल-फ़ज़्र भी कहा जाता है। इसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। वैसे ईद पर खजूर खाने की परंपरा है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह या एक बड़े खुले स्थान पर जाते हैं, जहां पूरा समुदाय एक साथ ईद की नमाज़ अदा करता है। नमाज के बाद, ईद की बधाईयां दी जाती है। उस समय ईद-मुबारक कहा जाता है। ये एक दूसरे के प्यार और आपसी भाईचारे को दर्शाता है।

ईद-उल-फितर के मौके पर एक खास दावत तैयार की जाती है। जिसमें खासतौर से मीठा खाना शामिल होता है। इसलिए इसे भारत और कुछ दक्षिण एशियाई देशों में मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर पर खासतौर से सेवइयां व चावल को दूध के साथ उबालकर बनाया जाता है और इसे सूखे मेवों और फलों के साथ खिलाया जाता है।

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