शिक्षा के स्तर को बनाये रखने के लिए शिक्षक को शिक्षक ही रहने दो – ओमप्रकाश मीना

शिक्षा के स्तर को बनाये रखने के लिए शिक्षक को शिक्षक ही रहने दो – ओमप्रकाश मीना

शिक्षा के स्तर को बनाये रखने के लिए शिक्षक को शिक्षक ही रहने दो – ओमप्रकाश मीना

सवाई माधोपुर, भारतीय संस्कृति हो या पाश्चात्य सभी में शिक्षक को सर्वोत्तम स्थान प्राचीन काल से ही प्राप्त है। हमारी संस्कृति ने तो शिक्षक को भगवान से भी बड़ा दर्जा दिया है। शिक्षक का उद्देश्य सिर्फ शिक्षा देना ही नहीं है, बल्कि समाज में स्थापित बुराइयों को दूर कर चरित्र निर्माण करना भी है। शिक्षा का अर्थ किसी बालक को केवल किताबी ज्ञान कराना नहीं है, बल्कि उसमें चरित्र निर्माण, अनुशासन और तमाम सद्गुणों का समावेश करना भी है। यह कहना है कि शिक्षक ओमप्रकाश मीना का।

मीना ने कहा कि शिक्षा को मानव व्यक्तित्व के विकास का साधन माना जाता है और शिक्षा का स्तर ही व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान दिलाता है। 5 सितम्बर को डॉ. सर्वपल्ली राधकृष्णन जी के जन्मदिन पर उनके द्वारा शिक्षा जगत में सराहनीय योगदान के कारण शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 1962 में राष्ट्रपति बनने के डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था। उनके विचार में शिक्षक होने का हकदार वह व्यक्ति को है, जो लोगों से अधिक बुद्धिमान, विनम्र और एक जिम्मेदार नागरिक बनाने वाला हो। डॉ. राधाकृष्णन शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे।

लेकिन आज के इस वैश्विक और आर्थिक युग में हर इंसान सुखी संपन्न होना चाहता है और ऐसे में शिक्षक भी पैसे के पीछे भागते नजर आने लगे हैं। परिणाम स्वरूप ट्यूशन जैसी प्रवृत्ति का जन्म हुआ है। साइड बिजनेस प्रारम्भ करने से अब गुरु जी भी शिक्षण कार्य से मन चुराने लगे। कर्तव्य से हटकर अनैतिक तरीकों से नई-नई सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होना शिक्षा जगत के लिए हानिकारक हैं। आज शिक्षक और विद्यार्थी के इस तरह के संबंध नहीं रहे हैं।

एक तरफ शिक्षकों की मनोदशा के बारे में भी सोचने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ शिक्षकों को मिलने वाले सम्मान में भी कमी आ रही है।

उन्होने कहा कि देखा जाए तो एक अन्य पक्ष यह भी है कि आज का समाज शिक्षकों के प्रति उदासीनता दिखाने में पीछे नहीं है। समाज भी शिक्षकों के कधों पर बच्चों के भविष्य निर्माण का भार तो सौंप देता है, लेकिन शिक्षकों के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाता है। समाज, सरकार और शिक्षा में तालमेल न होने के कारण शिक्षकों के सामाजिक स्थान एवं दर्जे में भारी गिरावट आ गई है। समाज और शिक्षक के बीच की यही दूरी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में अव्यवस्था पैदा कर रहा है।

वही सरकार ने शिक्षक के शिक्षण कार्य को गौण समझते हुए जन्म मरण के आंकड़े इकट्ठे करने से लेकर, शौचालय निर्माण, नसबन्दी कैस लाने तक की जिम्मेदारी का भार गुरुजी के कंधे पर डाल दिया। आज शिक्षक के पास इतने कार्यों का बोझ है कि अब शिक्षक केवल शिक्षक नहीं रह गया है। जिसके कारण शिक्षण कार्य में पर्याप्त समय न दे पाने के कारण शिक्षक – शिष्य के बीच दूरी होने लगी, सम्बन्धों में नैतिकता का पतन होने लगा। कुल मिलाकर शिक्षक-शिष्य के सम्मानजक सम्बन्धों की छवि को खराब करने में दोनों का ही योगदान है। शिक्षकों की उदासीनता और बच्चों की दिशाहीनता दोनों ही शिक्षा की गिरते स्तर के लिए जिम्मेदार हैं।

जरूरत इस बात की है कि दोनों अपनी जिम्मेदारी को इमानदारीपूर्वक निर्वाह करे। शिक्षा व्यवस्था में मौजूद खामियों का पता लगाकर अनुकूल शैक्षिक वातावरण का निर्माण करना उनका दायित्व है। यही नहीं आधुनिक शिक्षा प्रणाली को अपनाते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास करने की क्षमता भी एक शिक्षक में होना अनिवार्य है, ताकि छात्रों का शैक्षणिक, मानसिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास हो सके।

कहा जाता है बच्चे तो बहते हुए पानी की तरह है, अर्थात् उन्हें जिस आकार में चाहे ढाला जा सकता है। छात्रों के भविष्य को बनाना और बिगाड़ना काफी हद तक शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर हैं इसलिए ‘शिक्षक दिवस‘ के इस अवसर पर जरुरत इस बात की है कि हम यह तय कर सकें कि कैसे शिक्षक-शिष्य सम्बन्धों को मजबूत करते हुए बदलते प्रतिमानों के साथ उनकी भूमिका को और भी सशक्त रूप दिया जा सकता है ? ऐसे में आज का यह दिन काफी महत्वपूर्ण है और इसी दिन के बहाने ही हम शिक्षकों को याद और सम्मान कर उनके प्रति आभार प्रकट कर सकते हैं।

About Pankaj Sharma

Manager at Gangapur City Portal

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